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उत्तर प्रदेश: 500 साल पुरानी राजा साहब की कोठी बनी इतिहास की पहचान
 

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उत्तर प्रदेश  Published by: Gyanendra Bahadur Singh , Date: 07/05/2026 10:36:33 am Share:
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  • Date:
  • 07/05/2026 10:36:33 am
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की मिट्टी अपने भीतर न जाने कितने अनकहे इतिहास और शौर्य की गाथाएं समेटे हुए है।

विस्तार

उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की मिट्टी अपने भीतर न जाने कितने अनकहे इतिहास और शौर्य की गाथाएं समेटे हुए है। इन्हीं में से एक रत्न है मौरावां कस्बा, जहाँ की गलियां आज भी राजशाही वैभव और स्थापत्य कला की गवाह हैं। तस्वीर में दिख रही यह भव्य किंतु जीर्ण-शीर्ण इमारत केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि 400-500 साल पुराने उस दौर का दर्पण है, जब यहाँ की कोठियों में वैभव बसता था। इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि मौरावां की स्थापना उमराज धुज नामक एक प्रतापी सूर्यवंशी छतरी ने की थी। यह क्षेत्र सदियों से शक्ति का केंद्र रहा है। 16वीं शताब्दी के ऐतिहासिक दस्तावेज 'आइन-ए-अकबरी' में भी इस स्थान का विशेष उल्लेख मिलता है। उस दौर में यह एक परगना की राजधानी हुआ करता था, जहाँ बैस राजपूतों का अधिपत्य था और सुरक्षा के लिए यहाँ एक मजबूत ईंटों का किला निर्मित था।

 

मुगल और अवधी शैली का संगम तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि राजा साहब की यह कोठी अपनी नक्काशीदार मेहराबों, ऊंचे बुर्जों और बारीक कलाकारी के लिए जानी जाती थी। इसकी बनावट में मल्टी-फॉइल्ड आर्च (बहु-कोणीय मेहराब): जो अवधी वास्तुकला की पहचान हैं। झरोखे और बुर्ज जो सुरक्षा और सुंदरता दोनों का प्रतीक थे। ईंटों की मजबूती सदियां बीत जाने के बाद भी, बिना किसी आधुनिक तकनीक के, ये दीवारें आज भी सीना ताने खड़ी हैं।

वक्त की मार और सिसकती धरोहर

आज मौरावां में ऐसी कई प्राचीन इमारतें और कोठियां हैं जो संरक्षण की राह देख रही हैं। झाड़ियों से घिरी यह इमारत हमें याद दिलाती है कि समय कितना भी बलवान क्यों न हो, विरासत अपनी जड़ों को आसानी से नहीं छोड़ती। एक समय यहाँ चहल-पहल हुआ करती थी, न्याय होता था और उत्सव मनाए जाते थे।