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उत्तर प्रदेश: मौरावां की मशहूर महाबीर रबड़ी का स्वाद आज भी  बरकरार

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उत्तर प्रदेश  Published by: Gyanendra Bahadur Singh , Date: 07/05/2026 10:32:18 am Share:
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  • 07/05/2026 10:32:18 am
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: मौरावां एक छोटा सा कस्बा, लेकिन अपने भीतर इतिहास, परंपरा और स्वाद की ऐसी खुशबू समेटे हुए, जिसे एक बार महसूस कर लिया तो जिंदगी भर याद रहती है।

विस्तार

उत्तर प्रदेश: मौरावां एक छोटा सा कस्बा, लेकिन अपने भीतर इतिहास, परंपरा और स्वाद की ऐसी खुशबू समेटे हुए, जिसे एक बार महसूस कर लिया तो जिंदगी भर याद रहती है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की पुरवा तहसील में बसा मौरावां, जिसे लोग प्यार से “छोटी काशी” भी कहते हैं, आज भी अपने पुराने रंग-ढंग और सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है। लखनऊ के मोहनलालगंज से सिसेंडी और कालूखेड़ा होते हुए करीब 34 किलोमीटर की दूरी तय करें, और आप पहुंच जाएंगे इस अनोखे स्वाद की नगरी में। मौरावां का प्राचीन चन्दन गंज बाजार। संकरी गलियां, पुरानी इमारतें, और हर मोड़ पर इतिहास की झलक। बड़ा फाटक से छोटी फाटक की ओर बढ़ते हुए, ठीक सामने एक ऐसी दुकान दिखती है, जो सिर्फ दुकान नहीं बल्कि एक परंपरा है। “महाबीर की गीली बर्फी/रबड़ी”। साल 1920 से लगातार चल रही ये दुकान आज भी उसी सादगी और असली स्वाद के साथ लोगों के दिलों में बसी हुई है। यहां का नाम सुनते ही अक्सर एक सवाल जरूर उठता है। “महाबीर की रबड़ी खाई या नहीं?”

इस स्वाद की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है जितना इसका जायका। पहली पीढ़ी में स्वर्गीय श्री राम आसरे जी ने इस परंपरा की नींव रखी, फिर दूसरी पीढ़ी में स्वर्गीय श्री महाबीर जी ने इसे पहचान दी। आज तीसरी पीढ़ी के रूप में जितेंद्र गुप्ता इस विरासत को उसी मेहनत और लगन से आगे बढ़ा रहे हैं। दुकान की दीवारों और छतों पर आज भी लकड़ी के चूल्हे की कालिख साफ दिखाई देती है, जो इस बात की गवाही देती है कि यहां का स्वाद किसी मशीन या शॉर्टकट से नहीं, बल्कि परंपरागत तरीके से तैयार होता है। सुबह करीब 10 बजे से ही यहां रबड़ी बनने की शुरुआत हो जाती है। लकड़ी के चूल्हे पर धीरे-धीरे पकता दूध, उसकी सोंधी खुशबू, और लगातार चलती कड़छी ये सब मिलकर तैयार करते हैं वो लाजवाब रबड़ी, जिसका स्वाद शब्दों में बयान करना मुश्किल है। दोपहर 2 बजे तक 5-6 घान (बैच) तैयार हो जाते हैं, और जैसे ही एक घान बनता है, वैसे ही उसकी बिक्री शुरू हो जाती है। यही वजह है कि शाम 5 बजे तक अक्सर पूरी रबड़ी खत्म हो जाती है। कीमत की बात करें तो आज भी इसका रेट ₹350 प्रति किलो है, लेकिन जो स्वाद और अनुभव यहां मिलता है, उसके सामने ये कीमत बहुत छोटी लगती है। ये सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि मौरावां की पहचान है, एक एहसास है, जो हर आने-जाने वाले को अपनी ओर खींच ही लेता है। राजा मोरध्वज द्वारा बसाया गया मौरावां और चन्दन गंज बाजार आज भी प्राचीन चंदनेश्वर मंदिर की ओर जाता है। इन गलियों से गुजरते हुए, महाबीर की रबड़ी का स्वाद लेना जैसे इस सफर को पूरा कर देता है।