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मध्य प्रदेश: रतलाम नज़ूल विभाग पर जालसाज़ी व नागरिक उत्पीड़न के लगे गंभीर आरोप

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मध्य प्रदेश  Published by: Kamal Patni , Date: 04/02/2026 10:48:35 am Share:
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  • 04/02/2026 10:48:35 am
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संक्षेप

मध्य प्रदेश: भ्रम, जालसाज़ी और कूटरचित दस्तावेज़ों से नागरिक उत्पीड़न रतलाम में राजकीय संपत्ति के संरक्षण का दायित्व निभाने वाला नज़ूल विभाग आज स्वयं गंभीर संदेह के घेरे में है।

विस्तार

मध्य प्रदेश: भ्रम, जालसाज़ी और कूटरचित दस्तावेज़ों से नागरिक उत्पीड़न रतलाम में राजकीय संपत्ति के संरक्षण का दायित्व निभाने वाला नज़ूल विभाग आज स्वयं गंभीर संदेह के घेरे में है। एक ही भूमि और एक ही प्रकरण में बार-बार बदलती जानकारी, परस्पर विरोधी उत्तर, और संदिग्ध दस्तावेज़ प्रस्तुत कर आम नागरिकों को जानबूझकर भ्रमित और प्रताड़ित किया जा रहा है। कभी भूमि को नज़ूल बताया जाता है, कभी निजी, कभी रिकॉर्ड उपलब्ध होने की बात कही जाती है तो कभी वही रिकॉर्ड “लुप्त” घोषित कर दिया जाता है। यह स्थिति प्रशासनिक अव्यवस्था नहीं, बल्कि सुनियोजित अनियमितता का संकेत देती है। राजकीय संपत्ति के मामलों में पुराने वैधानिक आदेशों, नामांतरण प्रविष्टियों और स्वीकृत दस्तावेज़ों को नजरअंदाज कर नए-नए पत्र, नोटशीट और कथित अभिलेख सामने लाए जा रहे हैं, जिनकी प्रामाणिकता स्वयं प्रश्नों के घेरे में है। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी में बार-बार परिवर्तन होना, अधूरी या भ्रामक सूचना देना और तथ्यों को छिपाना यह दर्शाता है कि सच्चाई उजागर न हो, इसके लिए कूटरचित या मनगढ़ंत दस्तावेज़ों का सहारा लिया जा रहा है।

 

चिंताजनक तथ्य यह है कि जिन भूमियों को वर्षों पहले वैधानिक रूप से क्रय-विक्रय या नामांतरण द्वारा निजी स्वामित्व में स्वीकार किया जा चुका है, उन्हें आज पुनः राजकीय संपत्ति बताकर नागरिकों को अपराधी के समान व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। इससे न केवल नागरिक अधिकारों का हनन हो रहा है, बल्कि वास्तविक राजकीय संपत्ति की सुरक्षा भी संदेह के घेरे में आ गई है, क्योंकि मनमानी और चयनात्मक कार्रवाई से अवैध कब्जों को संरक्षण मिलता है। रतलाम नज़ूल विभाग की यह कार्यशैली स्पष्ट रूप से यह प्रश्न खड़ा करती है कि क्या राजकीय संपत्ति का उपयोग कानून के अनुसार हो रहा है या फिर उसे दबाव, भ्रष्टाचार और निजी हितों के लिए हथियार बनाया जा रहा है। यदि समय रहते स्वतंत्र जांच, दस्तावेज़ों का फॉरेंसिक ऑडिट और जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं की गई, तो यह नज़ूल प्रबंधन नहीं बल्कि राजकीय अराजकता का उदाहरण बन जाएगा। लोकतंत्र में राजकीय संपत्ति जनता की धरोहर होती है, न कि अधिकारियों की मनमर्जी का साधन। अधिकारों के साथ जवाबदेही तय किए बिना न तो संपत्ति सुरक्षित रह सकती है और न ही नागरिकों का शासन पर विश्वास।