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उत्तर प्रदेश: प्रसूता की मौत, मैटरनिटी सेंटर में लापरवाही और प्रशासनिक में टकराव
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संक्षेप
उत्तर प्रदेश: बड़हलगंज क्षेत्र के सिया मैटरनिटी सेंटर में प्रसूता प्रिया तिवारी की मौत का मामला अब सिर्फ एक चिकित्सीय लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक टकराव, जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति और न्यायिक सुस्ती का प्रतीक बनता जा रहा है।
विस्तार
उत्तर प्रदेश: बड़हलगंज क्षेत्र के सिया मैटरनिटी सेंटर में प्रसूता प्रिया तिवारी की मौत का मामला अब सिर्फ एक चिकित्सीय लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक टकराव, जिम्मेदारी से बचने की प्रवृत्ति और न्यायिक सुस्ती का प्रतीक बनता जा रहा है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि महिला की मौत का मुख्य कारण अत्यधिक आंतरिक रक्तस्राव (इंटरनल ब्लीडिंग) था। चिकित्सकीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रसव के बाद सही निगरानी, समय पर रक्तस्राव नियंत्रण और आपातकालीन उपचार मिलता, तो महिला की जान बचाई जा सकती थी। यह निष्कर्ष सीधे तौर पर संभावित मेडिकल नेग्लिजेंस की ओर इशारा करता है। घटना के सात दिन बीत जाने के बाद भी मुख्य आरोपी डॉ. पूनम यादव और उनका स्टाफ पुलिस गिरफ्त से बाहर हैं। पुलिस का कहना है कि कार्रवाई स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के आधार पर की जा रही है। वहीं स्वास्थ्य विभाग का तर्क है कि अस्पताल बिना वैध पंजीकरण के संचालित हो रहा था, जिसे सील कर दिया गया है — गिरफ्तारी करना पुलिस का दायित्व है।
दोनों विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर चल रही खींचतान से न्याय प्रक्रिया ठप पड़ती दिख रही है। बिना लाइसेंस चल रहा था मैटरनिटी सेंटर जांच में यह भी सामने आया है कि सिया मैटरनिटी सेंटर का लाइसेंस नवीनीकरण नहीं हुआ था, इसके बावजूद वहां प्रसव और ऑपरेशन किए जा रहे थे। यह स्वास्थ्य विभाग की निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। बिना लाइसेंस संचालन की जानकारी किसे थी? कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई? परिवार का आरोप रसूख के चलते देरी ,पीड़ित परिवार का आरोप है कि प्रभावशाली संबंधों और ढुलमुल जांच के कारण आरोपियों को फरार होने का अवसर मिला। परिजनों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र गिरफ्तारी नहीं हुई तो वे व्यापक आंदोलन करेंगे। स्थानीय नागरिकों में भी भारी रोष है। लोगों का कहना है कि क्षेत्र में निजी अस्पतालों की मनमानी, अप्रमाणित सुविधाएं और प्रशासनिक उदासीनता आम नागरिकों की जान जोखिम में डाल रही हैं। सवाल जो जवाब मांग रहे हैं। क्या दोषियों की गिरफ्तारी होगी? क्या स्वास्थ्य विभाग अपनी जवाबदेही तय करेगा? क्या पुलिस प्रशासन निष्पक्ष और त्वरित कार्रवाई करेगा। या विभागीय टकराव के बीच न्याय दम तोड़ देगा? यह मामला केवल एक परिवार का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता और प्रशासनिक जवाबदेही की कसौटी बन चुका है।
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