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उत्तर प्रदेश: ग्राम पंचायत में RTI में बड़ी अनियमितता, 646 पृष्ठों की जानकारी पर विवाद
 

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उत्तर प्रदेश  Published by: Indresh Kumar Pandey , Date: 04/04/2026 05:37:39 pm Share:
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  • 04/04/2026 05:37:39 pm
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: जनपद सोनभद्र के विकास खंड कोन अंतर्गत ग्राम पंचायत खेमपुर में सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं।

विस्तार

उत्तर प्रदेश: जनपद सोनभद्र के विकास खंड कोन अंतर्गत ग्राम पंचायत खेमपुर में सूचना का अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि सुनियोजित तरीके से सूचना छिपाने और संभावित वित्तीय अनियमितताओं की ओर इशारा करता है।प्राप्त जानकारी के अनुसार  राजेश कु.  जायसवाल  ने वर्ष 2021-22 से 2024-25 तक ग्राम पंचायत के खर्च, खरीद, भुगतान एवं संबंधित अभिलेखों की जानकारी RTI अधिनियम के तहत मांगी थी। नियमानुसार यह जानकारी 30 दिनों के भीतर उपलब्ध कराई जानी चाहिए थी, लेकिन निर्धारित समयसीमा में कोई जवाब नहीं दिया गया। करीब 35 दिन बाद संबंधित विभाग द्वारा आवेदक से ₹8500 का नकल शुल्क मांगा गया। हैरानी की बात यह रही कि इस शुल्क के साथ न तो कुल पृष्ठों की संख्या स्पष्ट की गई और न ही शुल्क निर्धारण का कोई आधार बताया गया।शिकायतकर्ता का आरोप है कि यदि ₹2 प्रति पृष्ठ के मानक के अनुसार गणना की जाए, तो ₹8500 के बदले लगभग 4250 पृष्ठों की जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए थी।  डीपीआरओ सोनभद्र के आदेश के बाद आवेदक को मात्र 646 पृष्ठ ही उपलब्ध कराए गए। इनमें भी कई दस्तावेज धुंधले, अपठनीय और अधूरे पाए गए। इस प्रकार लगभग 3600 से अधिक पृष्ठों की जानकारी गायब पाई गई, जिससे पूरे मामले पर संदेह गहरा गया है।इस प्रकरण में जिला पंचायत राज अधिकारी ने स्वयं माना कि शुल्क की मांग नियमों के विरुद्ध थी। उन्होंने आदेश जारी करते हुए निर्देश दिया कि आवेदक को बिना किसी शुल्क के 3 दिनों के भीतर पूरी जानकारी उपलब्ध कराई जाए। साथ ही चेतावनी दी गई कि आदेश का पालन न करने पर ₹250 प्रतिदिन (अधिकतम ₹25000) का जुर्माना लगाया जाएगा। इस पूरे घटनाक्रम ने कई अहम प्रश्न खड़े कर दिए हैं। 


₹8500 का शुल्क किस आधार पर निर्धारित किया गया?, 4250 पृष्ठों का दावा कहां गया?,-केवल 646 पृष्ठों में ही पूरी जानकारी क्यों सीमित रही?क्या शेष दस्तावेज जानबूझकर छिपाए जा रहे हैं?, क्या यह किसी बड़े वित्तीय घोटाले को दबाने की कोशिश है? यह मामला केवल एक ग्राम पंचायत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है जहां RTI जैसे पारदर्शिता के साधन का दुरुपयोग कर आम नागरिकों को हतोत्साहित किया जाता है।स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने निम्न मांगें उठाई हैं—पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच (विजिलेंस/एंटी करप्शन ब्यूरो से), संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाए, अवैध रूप से मांगे गए शुल्क की जांच  की जाए, सभी अभिलेख डिजिटल माध्यम से सार्वजनिक किए जाएं,-दोषी पाए जाने पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई हो। यदि इस मामले में शीघ्र और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं होती है, तो यह संकेत होगा कि व्यवस्था स्वयं भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रही है। वहीं, आम जनता अब इस मुद्दे पर मुखर हो रही है और पारदर्शिता की मांग तेज हो गई है।हर पन्ने का हिसाब होगा, हर जिम्मेदार से जवाब लिया जाएगा  यही इस मुद्दे पर जनता का स्पष्ट संदेश है।