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उत्तर प्रदेश: नोएडा मजदूर आंदोलन मामले में यूपी पुलिस की भूमिका पर प्रेस वार्ता, अधिवक्ताओं व कार्यकर्ताओं ने उठाए गंभीर सवाल

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उत्तर प्रदेश  Published by: Yogendra Kumar , Date: 20/04/2026 04:43:53 pm Share:
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  • 20/04/2026 04:43:53 pm
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: दिनांक 19 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ताओं और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। इस प्रेस वार्ता को सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्वेस, कवलप्रीत कौर, कबीर समेत सामाजिक का

विस्तार

उत्तर प्रदेश: दिनांक 19 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ताओं और प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा प्रेस क्लब ऑफ़ इण्डिया में प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। इस प्रेस वार्ता को सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्वेस, कवलप्रीत कौर, कबीर समेत सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार, सरोज गिरी, प्रियंवदा, श्रीजा ने सम्बोधित किया। इस प्रेस वार्ता के ज़रिये इन सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों ने इस बात के स्पष्ट प्रमाण पेश किये कि नोएडा आन्दोलन में हिंसा को भड़काने का काम को किस प्रकार यूपी पुलिस ने अंजाम दिया। यह भी बात सामने आयी कि यूपी पुलिस द्वारा इस मामले में झूठे आरोप मढ़कर तमाम सामाजिक कार्यकर्ताओं को फंसाया जा रहा है। इन कार्यकर्ताओं को इसलिए साज़िश का शिकार बनाया जा रहा है क्योंकि वे लगातार पुलिस के उकसावे की कार्रवाई को उजागर करने और आन्दोलन को शान्तिपूर्ण तरीक़े से चलाने का काम कर रहे थे। 

इस पूरे मामले में यूपी पुलिस गोदी मीडिया की मदद से एक सुनियोजित ट्रायल चलवा रही है। प्रेस क्लब में हुए इस वार्ता में संबोधकर्ताओं ने इस बात को भी रेखांकित किया कि यूपी पुलिस और आमतौर पर भाजपा सरकार के लिए "अर्बन नक्सल" और "पाकिस्तान" का जुमला एक टूलकिट बन चुका है। जहां कहीं भी उन्हें मज़दूरों, छात्रों, स्त्रियों और दलितों की उठती आवाज़ को दबाने की ज़रूरत महसूस होती है वहां उन्हें "अर्बन नक्सल" और "पाकिस्तान लिंक" घोषित कर दिया जाता है।  ग़ौरतलब है कि 16 अप्रैल की रात को देश के वरिष्ठ पत्रकार, जन बुद्धिजीवी और 'भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़' के सम्पादक सत्यम को नोएडा पुलिस ने ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से लखनऊ से उठा लिया था। 48 घण्टों तक उनके परिजनों को उनकी कोई जानकारी साझा नहीं की गयी। 18 अप्रैल की शाम को उन्हें नोएडा के सूरजपुर कोर्ट में पेश किया गया। उन्हें भी इस मसले में झूठे और बेबुनियादी आरोपों के तहत फंसाया जा रहा है।

 यूएनआई के अग्रणी पत्रकार रहे सत्यम दुनियाभर में अनुवादक के रूप में भी प्रसिद्ध हैं और जनवादी और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता हैं। ज्ञात हो कि पुलिस ने उनकी गिरफ़्तारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट के डी.के. बासु गाइडलाइन का पूरा उल्लंघन किया। सत्यम के ज़मानत के संवैधानिक अधिकार का भी हनन किया गया और उन्हें आनन फ़ानन में नोएडा से लखनऊ ले जाया गया।  यही नहीं, विश्व प्रसिद्ध कवयित्री, सामाजिक और स्त्री अधिकार कार्यकर्ता कात्यायनी को भी नोएडा पुलिस ने तक़रीबन 10 घण्टों तक बंधक बनाए रखा। कात्यायनी देशभर में स्त्री आन्दोलन की मुखर आवाज़ हैं और लखनऊ के इलाकों में बच्चों को पढ़ाने का काम करती हैं। 

कात्यायनी और सत्यम से सम्बन्धित देश भर के बुद्धिजीवी और पत्रकार इस बार की पुष्टि कर सकते हैं कि यूपी पुलिस किस प्रकार इन दो लोगों को अपने साज़िश का शिकार बना रही है और इनपर बेबुनियाद आरोप मढ़ रही है।  यह भी बता दें कि जनचेतना पर हुए छापे के लिए पुलिस के पास केवल एक फ्लोर का सर्च वॉरेंट था। इसके बावजूद उन्होंने पूरे प्रांगण की तलाशी ली और निजी सामानों — जैसे कि फ़ोन, लैपटॉप आदि को ज़ब्त कर लिया। इन ज़ब्त निजी समानों की कोई प्राप्ति नहीं दी गयी न इस खोजबीन के कारणों को ही स्पष्ट किया गया। यह साफ़ है कि जब पुलिस के पास कोई प्रमाण नहीं होता केवल तभी वह इस तरह की ग़ैर क़ानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करती है। 

प्रेस वार्ता के दौरान सभी वक्ताओं ने इस बात की पूरी आशंका जतायी कि यूपी पुलिस इस माध्यम से झूठे प्रमाण इंप्लांट कर सकती है। ऐसा हुआ भी तो यह कोई ताज्जुब की बात नहीं होगी क्योंकि अतीत में भी जनता के पक्ष में उठने वाली आवाज़ों को फंसाने के लिए पुलिस ने ऐसी घिनौनी हरकतों को अंजाम दिया है।  इस पूरी प्रक्रिया में पुलिस ने मज़दूर बिगुल पर भी मनगढ़ंत और बेबुनियादी आरोप लगाए हैं और गोदी मीडिया के ज़रिये ट्रायल चलवाकर फ़र्ज़ी और झूठे और बेबुनियाद आरोप लगाकर ज़हरीला प्रचार करवा रही है। ऐसे तमाम चैनलों को मज़दूर बिगुल द्वारा मानहानि के नोटिस भेजे गये हैं और आगे भी भेजे जाने और क़ानूनी कार्रवाई को चलाने की प्रक्रिया जारी है। मज़दूर बिगुल गिरफ़्तार 350 से ज़्यादा मज़दूरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों को फंसाए जाने और ग़ैर क़ानूनी, ग़ैर संवैधानिक प्रक्रिया के तहत इसे अंजाम देने की निन्दा करता है। इस प्रेस वार्ता के ज़रिये यह भी माँग की गई की इस पूरे ही मसले की उच्च स्तरीय न्यायिक जाँच होनी चाहिए।