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Guru Purnima: क्यों मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा ? जानिए इस पर्व का धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व
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संक्षेप
दिल्ली: भारत की सनातन परंपरा में गुरु का स्थान भगवान से भी ऊंचा माना गया है।
विस्तार
दिल्ली: भारत की सनातन परंपरा में गुरु का स्थान भगवान से भी ऊंचा माना गया है। इसी गुरु-शिष्य परंपरा को सम्मान देने के लिए प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को "गुरु पूर्णिमा" का पर्व मनाया जाता है। यह दिन अपने गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। देशभर के मंदिरों, आश्रमों और धार्मिक स्थलों पर विशेष पूजा-अर्चना, सत्संग, भजन-कीर्तन और गुरु वंदना का आयोजन किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। उन्होंने वेदों का विभाजन किया, महाभारत और 18 पुराणों की रचना की तथा सनातन धर्म के ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाया। इसी कारण उन्हें "आदि गुरु" भी कहा जाता है और गुरु पूर्णिमा को "व्यास पूर्णिमा" के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महर्षि वेदव्यास के साथ-साथ अपने जीवन के सभी गुरुओं का सम्मान करने की परंपरा है। हिंदू धर्म में गुरु को अज्ञान रूपी अंधकार से निकालकर ज्ञान का प्रकाश देने वाला माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु ही वह मार्गदर्शक है, जो व्यक्ति को सत्य, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलना सिखाता है। प्रसिद्ध श्लोक "गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः" गुरु के सर्वोच्च स्थान को दर्शाता है। गुरु पूर्णिमा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन, अनुशासन, सेवा और संस्कारों को अपनाने का भी संदेश देता है। इस अवसर पर श्रद्धालु अपने गुरु का पूजन कर उनका आशीर्वाद लेते हैं और जीवन में अच्छे विचारों एवं नैतिक मूल्यों का पालन करने का संकल्प लेते हैं। कई स्थानों पर धार्मिक प्रवचन, यज्ञ, भंडारे और सेवा कार्यों का आयोजन भी किया जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह पर्व गुरु और शिष्य के अटूट संबंध का प्रतीक है। आधुनिक समय में भी गुरु पूर्णिमा का महत्व कम नहीं हुआ है। आज केवल आध्यात्मिक गुरु ही नहीं, बल्कि माता-पिता, शिक्षक और जीवन में सही मार्ग दिखाने वाले सभी व्यक्तियों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का यह विशेष अवसर माना जाता है। गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा का प्रतीक है, जो ज्ञान, संस्कार, सेवा और मानवता को सर्वोच्च स्थान देती है। यही कारण है कि यह पर्व हर वर्ष पूरे देश में श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया जाता है।
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