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मध्य प्रदेश: अतिक्रमण हटाने पर उठे सवाल, क्या कार्रवाई में दोहरा मापदंड
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: रतलाम शहर में इन दिनों नगर निगम द्वारा मार्गों को चौड़ा करने के नाम पर अतिक्रमण हटाने की ताबड़तोड़ कार्यवाही की जा रही है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: रतलाम शहर में इन दिनों नगर निगम द्वारा मार्गों को चौड़ा करने के नाम पर अतिक्रमण हटाने की ताबड़तोड़ कार्यवाही की जा रही है। सड़कों, फुटपाथों एवं शासकीय भूमि पर किए गए अवैध अतिक्रमणों को हटाना निश्चित रूप से एक आवश्यक और सराहनीय कदम है। इससे यातायात सुगम होता है, शहर की सुंदरता बढ़ती है और आम नागरिकों को सुविधा मिलती है। परंतु इसी कार्यवाही के साथ एक गंभीर प्रश्न भी खड़ा हो रहा है। क्या कानून का पालन सभी के लिए समान रूप से हो रहा है, या फिर इसमें दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है? नगर निगम प्रशासन यह कह रहा है कि शासकीय भूमि और सड़कों से अतिक्रमण हटाने के लिए किसी न्यायालयीन आदेश की आवश्यकता नहीं होती। इसी आधार पर तेजी से कार्यवाही की जा रही है, लेकिन दूसरी ओर, जब बात आती है आम नागरिकों की निजी भूमि और भूखंडों पर वर्षों से किए गए अवैध कब्जों की, तो प्रशासन पूरी तरह मौन नजर आता है। कई मामलों में कलेक्टर कार्यालय और राजस्व न्यायालय के स्पष्ट आदेश मौजूद हैं। इसके बावजूद अतिक्रमण नहीं हटाए जा रहे। उल्टा, पीड़ित नागरिकों को ही बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। यह स्थिति न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या यह प्रशासनिक संरक्षण नहीं है, जब किसी अवैध कब्जे को हटाने के लिए न्यायालय और कलेक्टर के आदेश होने के बावजूद कार्यवाही नहीं होती, तो यह संदेह उत्पन्न होता है कि कहीं न कहीं। अवैध कब्जाधारियों को प्रशासनिक संरक्षण मिल रहा है। कुछ प्रभावशाली लोग कानून से ऊपर समझे जा रहे हैं और आम नागरिक के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो यह कानून के शासन (Rule of Law) के मूल सिद्धांत के विपरीत है। इस भेदभावपूर्ण रवैये का सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक को उठाना पड़ रहा है। अपनी ही जमीन पर कब्जा होते देख मानसिक पीड़ा, न्याय पाने के लिए वर्षों तक आर्थिक नुकसान, सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाकर समय और ऊर्जा की बर्बादी, जबकि दूसरी ओर, जिन लोगों ने शासकीय भूमि पर अतिक्रमण किया, उनके खिलाफ त्वरित कार्यवाही हो रही है।
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