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राजस्थान: मोक्ष का मार्ग, अहंकार और क्रोध से दूरी है जरूरी
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संक्षेप
राजस्थान: आर्हत वाड़मय में कहा गया है – जैन दर्शन व नव तत्व की जानकारी के से मोक्ष का रूप हमें प्राप्त हो जाता है |
विस्तार
राजस्थान: आर्हत वाड़मय में कहा गया है – जैन दर्शन व नव तत्व की जानकारी के से मोक्ष का रूप हमें प्राप्त हो जाता है | मोक्ष अवस्था में कोई कर्म व योग हमारे साथ नहीँ रहते | सिद्ध अशरीरी, अवाणी व अमन वाले होते है | आक्रोश व गुस्सा मोक्ष प्राप्ति की एक वाधा है | मोक्ष प्राप्ति की दूसरी वाधा है – अहंकार व घमंड | ज्ञानावर्णीय कर्म के क्षयोपशम के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीँ होती | ज्ञान तथा विद्वता होने पर भी किसी रूप में कोई दिखावा न हो व मौन रहें | शक्ति व बल का भी प्रदर्शन न करें | जप तप में भी न नाम तथा सम्मान का भाव हो और न नाम की आकांक्ष | यदि आपका चेहरा सुंदर है तो उसकी की सुंदरता का अहं न रहे | तप में कोई आयोजन व कार्यक्रम न रहना ही तप की शोभा है | यदि आप शक्तिशाली व बलशाली हैं तो उस शक्ति का अच्छा उपयोग करें, पर धमंड न करें | साधु गौचरी जाए व अच्छी प्राप्ति हो जाय तो भी अपनी क्षमता पर अभिमान न हो | देव आपके पास आ जाए तो भी उसका धमण्ड न हो | राजनीति के क्षेत्र में भी बिना सोचे कोई काम ना करें, सोच विचार कर काम करना ही करणीय है | सदा श्रम व परीश्रम करते रहो | काम से जी मत चुराओ | आलस्य क्षत्रु व श्रम बंधु | काम के प्रयास में कोई संकोच न हो | काम करके यदि निर्जरा हो तो उससे वंचित क्यों रहें | सहनशीलता, स्वावलबंन व कर्तव्य के प्रति जागरूक रहें |
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