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झारखण्ड: डॉ. कौशल किशोर जायसवाल का वनराखी आंदोलन 50 वर्ष पूर्ण, पर्यावरण संरक्षण की प्रेरक मिसाल

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झारखण्ड  Published by: Arun Kumar Ravi , Date: 04/06/2026 03:17:06 pm Share:
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  • 04/06/2026 03:17:06 pm
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संक्षेप

झारखण्ड: जब पर्यावरण संरक्षण पर चर्चा भी सीमित थी और जलवायु परिवर्तन जैसे शब्द आम लोगों की समझ से दूर थे, तब पलामू की धरती पर एक युवा ने प्रकृति को बचाने का संकल्प लिया।

विस्तार

झारखण्ड: जब पर्यावरण संरक्षण पर चर्चा भी सीमित थी और जलवायु परिवर्तन जैसे शब्द आम लोगों की समझ से दूर थे, तब पलामू की धरती पर एक युवा ने प्रकृति को बचाने का संकल्प लिया। वर्ष 1966 के भीषण अकाल ने उस युवा के मन-मस्तिष्क पर ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि उसने अपना पूरा जीवन वृक्षारोपण, जंगल संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता को समर्पित कर दिया। वह युवा आज अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पर्यावरणविद् डॉ. कौशल किशोर जायसवाल के नाम से जाना जाता है। इस वर्ष उनके द्वारा शुरू किया गया वनराखी आंदोलन अपने गौरवशाली 50 वर्ष पूरे कर रहा है। आधी सदी पहले शुरू हुआ यह अभियान आज एक जन-आंदोलन का स्वरूप ले चुका है, जिसने लाखों लोगों को पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित किया है।

अकाल से मिली सीख, पर्यावरण बना जीवन का मिशन

डॉ. कौशल बताते हैं कि 1966 के भीषण अकाल ने उन्हें यह समझाया कि जल, जंगल और जमीन ही मानव सभ्यता की वास्तविक नींव हैं। प्रकृति के बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है। इसी सोच से प्रेरित होकर उन्होंने "पर्यावरण धर्म" और "वनराखी आंदोलन" की स्थापना की। उनका संदेश सरल लेकिन गहरा है—“ऊपर सूर्य देव और नीचे वृक्ष देव हैं। यदि ये दोनों नहीं रहेंगे तो पृथ्वी पर जीवन भी नहीं रहेगा।”

59 लाख पौधे और 26 लाख वृक्षों को बांधी गई राखी

पिछले छह दशकों में डॉ. कौशल ने भारत के 26 राज्यों के 181 जिलों के अलावा नेपाल, भूटान, म्यांमार, सिंगापुर, मलेशिया, अज़रबैजान, थाईलैंड, इंडोनेशिया, जापान और वियतनाम जैसे देशों में पर्यावरण संरक्षण का संदेश पहुंचाया है। उनके नेतृत्व में लगभग 59 लाख पौधों का निःशुल्क वितरण एवं रोपण किया जा चुका है। वहीं 26 लाख से अधिक वृक्षों पर राखी बांधकर उन्हें संरक्षण का संकल्प दिलाया गया है। यही पहल आगे चलकर वनराखी आंदोलन की पहचान बनी।

डाली का जंगल बना पर्यावरण चेतना का केंद्र

पलामू जिले के छतरपुर अनुमंडल स्थित डाली गांव आज डॉ. कौशल के वर्षों के परिश्रम की जीवंत मिसाल है। जहां कभी बंजर जमीन थी, वहां आज हरियाली का विशाल संसार दिखाई देता है। डाली स्थित मोहनलाल खुर्जा-पार्वती देवी पार्क में 22 देशों की 200 से अधिक प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। इनमें कई दुर्लभ, औषधीय और विदेशी प्रजातियां शामिल हैं। यह क्षेत्र आज शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और पर्यावरण प्रेमियों के लिए अध्ययन का प्रमुख केंद्र बन चुका है।

दुनिया का पहला ‘पर्यावरण धर्म ज्ञान वृक्ष देव मंदिर’

पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ने के उद्देश्य से 12 फरवरी 2026 को डाली में दुनिया के पहले “पर्यावरण धर्म ज्ञान वृक्ष देव मंदिर” का उद्घाटन किया गया। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां किसी मूर्ति की नहीं, बल्कि वृक्षों की पूजा की जाती है। वृक्षों को ही देवस्वरूप मानकर उनकी रक्षा का संदेश दिया जाता है। मंदिर के उद्घाटन में देश-विदेश के पर्यावरणविदों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया।

कभी कहा गया ‘पागल’, आज दुनिया मान रही मिसाल

डॉ. कौशल बताते हैं कि जब उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को पौधे बांटना शुरू किया था, तब लोग उनका मजाक उड़ाते थे। कई लोगों ने उन्हें “पागल” तक कहा। लेकिन उन्होंने अपने मिशन से समझौता नहीं किया। कोरोना महामारी के दौरान ऑक्सीजन संकट ने पूरी दुनिया को यह अहसास कराया कि वृक्ष मानव जीवन के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं। तब लोगों को उनके वर्षों पुराने संदेश की प्रासंगिकता समझ में आई।

किसानों को सिखाई वृक्ष आधारित खेती

डॉ. कौशल लंबे समय से किसानों को वृक्ष आधारित खेती के लिए प्रेरित करते रहे हैं। उनका मानना है कि वृक्ष किसानों के लिए “फिक्स्ड डिपॉजिट” की तरह होते हैं, जो भविष्य में आर्थिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। वे कहते हैं कि जंगल और वृक्ष केवल पर्यावरण की नहीं, बल्कि देश की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की भी आधारशिला हैं। पर्यावरण संरक्षण में उनके योगदान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक सम्मान मिला है। उनकी जीवनी सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों में शामिल की जा चुकी है। अब तक उन्हें लगभग 80 सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें 10 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी शामिल हैं।

एक व्यक्ति से शुरू हुआ आंदोलन, लाखों लोगों का अभियान बना

वनराखी आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह किसी सरकारी योजना या बड़े संगठन की पहल नहीं थी। यह एक व्यक्ति के संकल्प से शुरू हुआ और आज लाखों लोगों की भागीदारी वाला जन-आंदोलन बन चुका है। विश्व पर्यावरण दिवस पर डॉ. कौशल किशोर जायसवाल की जीवन यात्रा यह संदेश देती है कि यदि संकल्प मजबूत हो तो एक अकेला व्यक्ति भी समाज और प्रकृति दोनों की दिशा बदल सकता है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जल संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, तब वनराखी आंदोलन आशा और प्रेरणा का प्रतीक बनकर सामने खड़ा है। प्रकृति की रक्षा ही मानवता की रक्षा है। यही डॉ. कौशल किशोर जायसवाल के पांच दशक लंबे संघर्ष का मूल संदेश है।