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मध्य प्रदेश: अवैध रेत उत्खनन पर उठे सवाल, प्रशासनिक कार्रवाई पर घिरा तंत्र
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: माननीय सुप्रीम कोर्ट ने चंबल अभ्यारण्य के मामले में मध्य प्रदेश सरकार को दो टूक सुनाया है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: माननीय सुप्रीम कोर्ट ने चंबल अभ्यारण्य के मामले में मध्य प्रदेश सरकार को दो टूक सुनाया है। “सिर्फ ट्रक ड्राइवर और क्लीनर को पकड़कर इतिश्री मत करो, रेत माफिया के बड़े खिलाड़ियों पर हाथ डालो।” कोर्ट की यह टिप्पणी शहडोल जिले के प्रशासनिक अधिकारियों के चश्मे पर जमी धूल साफ करने के लिए काफी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या साहब लोग चश्मा साफ करना भी चाहते हैं? शहडोल जिले में इन दिनों विज्ञान और चमत्कार का एक अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। जिले में रेत ठेके की खदानें आधिकारिक तौर पर शुरू ही नहीं हुई हैं, लेकिन देवलोद (बाणसागर), ब्यौहारी, जयसिंहनगर, गोहपारू, सोहागपुर, बुढार और जैतपुर की सड़कों पर रेत से लदे ट्रैक्टर और ट्रक ऐसे दौड़ रहे हैं जैसे कोई मैराथन चल रही हो। यह रेत आ कहाँ से रही है? प्रशासन के लिए एक यक्ष प्रश्न: जब दुकानें खुली ही नहीं, तो सामान बाजार में कैसे बिक रहा है? क्या शहडोल के नदी-नाले इतने दयालु हो गए हैं कि वे खुद ही रेत छानकर माफियाओं की गाड़ियों में लोड कर दे रहे हैं? या फिर रात के अंधेरे में कोई ‘दैवीय शक्ति’ आती है और सोन घड़ियाल अभ्यारण्य का सीना चीरकर रेत गायब कर देती है? बचाव के लिए दूसरे जिले या प्रदेश की टीपी कभी कभार दिया जाता हो लेकिन सब जानते हैं कि यह रेत कहाँ से आ रही है और किसके आशीर्वाद से आ रही है। लेकिन जिम्मेदार अधिकारी ऐसे अनजान बने बैठे हैं जैसे उन्होंने गांधी जी के तीन बंदरों का कड़ा कसम-बयान ले रखा हो—न अवैध उत्खनन देखेंगे, न माफिया की आवाज सुनेंगे और न ही उनके खिलाफ कुछ बोलेंगे। जब कभी जनता का दबाव बढ़ता है या ऊपर से कोई आदेश आता है, तो पुलिस और खनिज विभाग की ‘सिंघम’ टोली मैदान में उतरती है। कार्रवाई के नाम पर किसी गरीब ड्राइवर को पकड़ लिया जाता है, जिसका कसूर सिर्फ इतना होता है कि वह चंद रुपयों की दिहाड़ी के लिए स्टेयरिंग थामे बैठा था। वाहन मालिक पर जुर्माना ठोक दिया जाता है लेकिन वह ‘सफेदपोश’ रेत माफिया, जो वातानुकूलित कमरों में बैठकर इस पूरे सिंडिकेट का रिमोट कंट्रोल दबा रहा है, उसकी तरफ कोई उंगली भी नहीं उठाता। ‘बड़ी मछलियों’ को छूने में अधिकारियों के हाथ कांपने लगते हैं, क्योंकि उन मछलियों के तार सीधे सत्ता और रसूख के ‘पावर हाउस’ से जुड़े होते हैं। सोन घड़ियाल अभ्यारण्य, सिर्फ कागजों पर सुरक्षित चंबल की तरह शहडोल का सोन घड़ियाल अभ्यारण्य भी अब घड़ियालों से ज्यादा रेत चोरों की शरणस्थली बन चुका है। जिस प्रतिबंधित क्षेत्र में परिंदा भी पर नहीं मार सकता, वहाँ जेसीबी की गड़गड़ाहट और ट्रकों के हॉर्न गूंज रहे हैं। वन्यजीव बेचारे मूकदर्शक बनकर देख रहे हैं कि इंसानी लालच कैसे उनके आशियाने को निगल रहा है। बाकी वहां अब शुभ ही शुभ है, जिले से माठा पड़ने का भी डर नहीं। शहडोल की जनता सब समझती है कि इस ‘अवैध’ खेल में किसका ‘वैध’ हिस्सा तय है। अगर ऐसा न होता, तो बिना किसी वैध रॉयल्टी और ठेके के, पूरे जिले की नदियों को इस बेरहमी से नंगा न किया जाता। सुप्रीम कोर्ट की फटकार तो आ गई है, लेकिन देखना यह है कि शहडोल का प्रशासन इस बार भी सिर्फ ‘ड्राइवरों’ की बली चढ़ाकर पल्ला झाड़ लेता है, या फिर इस अवैध साम्राज्य के असली ‘किंगपिन’ तक पहुंचने की हिम्मत दिखाता है। वैसे उम्मीद कम ही है, क्योंकि साहब… अगर जड़ ही काट दी, तो फिर हर महीने ‘फसल’ कौन काटेगा।
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