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मध्य प्रदेश: जवाबदेही बनाम विवेकाधिकार, लोकतंत्र में न्याय पर उठे सवाल
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में जवाबदेही, उत्तरदायित्व और कानून के प्रति बाध्यता को प्रशासन की मूल आत्मा माना जाता है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में जवाबदेही, उत्तरदायित्व और कानून के प्रति बाध्यता को प्रशासन की मूल आत्मा माना जाता है। किसी भी सार्वजनिक पद पर बैठा अधिकारी, कर्मचारी या जनप्रतिनिधि जनता का सेवक और संरक्षक होता है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि जवाबदेही और पारदर्शिता की जगह विवेकाधिकार और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का हवाला अधिक दिया जाने लगा है। इसी विषय को लेकर सामाजिक चिंतक कमल पाटनी ने एक विस्तृत टिप्पणी जारी करते हुए प्रशासनिक कार्यप्रणाली और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि कानून विभिन्न कार्यों के लिए स्पष्ट समय-सीमा निर्धारित करता है, न्यायालय समय पर आदेश जारी करते हैं और नियम प्रक्रियाओं को परिभाषित करते हैं। इसके बावजूद अनेक मामलों में अधिकारी महीनों और वर्षों तक जवाब प्रस्तुत नहीं करते, आवश्यक अभिलेख उपलब्ध नहीं कराते और कई बार न्यायालयों के आदेशों के पालन में भी देरी होती है। इसका सीधा प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ता है, जिन्हें अपने अधिकारों के लिए लगातार कार्यालयों और अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कमल पाटनी ने कहा कि सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यदि कोई नागरिक निर्धारित समय-सीमा का उल्लंघन करता है तो उस पर तत्काल जुर्माना, दंड या कानूनी कार्रवाई हो जाती है, लेकिन जब कोई अधिकारी अपने वैधानिक दायित्वों का पालन नहीं करता, तब अक्सर विवेकाधिकार, प्रक्रियाधीन या प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर उसे संरक्षण मिल जाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि जवाबदेही केवल जनता के लिए और विवेकाधिकार केवल अधिकारियों के लिए है, तो न्याय की वास्तविक परिभाषा क्या रह जाती है।उन्होंने स्पष्ट किया कि न्याय केवल अदालतों में फैसला सुनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि समय पर निर्णय, समय पर सूचना, समय पर कार्रवाई और कानून के समक्ष समान उत्तरदायित्व ही वास्तविक न्याय की पहचान है। यदि सूचना के अधिकार (RTI) के जवाब समय पर नहीं मिलते, राजस्व अभिलेख वर्षों तक लंबित रहते हैं, न्यायालयों के आदेशों का पालन नहीं होता और अधिकारियों की लापरवाही पर कोई प्रभावी दंड तय नहीं होता, तो आम नागरिकों के मन में व्यवस्था के प्रति असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विवेकाधिकार का उद्देश्य जनहित में निर्णय लेना होता है, न कि जवाबदेही से बचने का माध्यम बनना। विवेकाधिकार कभी भी कानून, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व से ऊपर नहीं हो सकता। उन्होंने मांग की कि शासन व्यवस्था में यह सिद्धांत प्रभावी रूप से लागू होना चाहिए कि अधिकार जितना बड़ा होगा, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक कर्तव्य पालन में विफल अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी और उनके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक सुशासन और न्याय की अवधारणा अधूरी रहेगी। वास्तविक लोकतंत्र और सुशासन वहीं संभव है, जहां नागरिक और अधिकारी दोनों कानून के समक्ष समान रूप से उत्तरदायी हों। अंत में उन्होंने कहा कि यदि जवाबदेही, उत्तरदायित्व और बाध्यता व्यवस्था से गायब हो जाएं, तो जनता के मन में यह प्रश्न लगातार गूंजता रहेगा जवाबदेही कहाँ है? उत्तरदायित्व कहाँ है? बाध्यता कहाँ है? और यदि ये सब नहीं हैं, तो न्याय कहाँ है?
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