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उत्तर प्रदेश: आरटीआई पर चुप्पी से घिरी पंचायत, विकास कार्यों में गड़बड़ी के लगे आरोप
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संक्षेप
उत्तर प्रदेश: कौधियारा, प्रयागराज, यमुनानगर क्षेत्र के करछना तहसील अंतर्गत विकास खण्ड कौधियारा की ग्राम पंचायत उमरी में विकास कार्यों को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
विस्तार
उत्तर प्रदेश: कौधियारा, प्रयागराज, यमुनानगर क्षेत्र के करछना तहसील अंतर्गत विकास खण्ड कौधियारा की ग्राम पंचायत उमरी में विकास कार्यों को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी पर दो माह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कोई जवाब न मिलने से पंचायत प्रशासन, जनसूचना अधिकारी, ग्राम पंचायत सचिव और संबंधित अधिकारियों की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई है। गांव के समाजसेवी देव कृष्ण द्विवेदी पत्रकार द्वारा ग्राम पंचायत में बीते पांच वर्षों के विकास कार्यों, आय-व्यय, तालाब खुदाई, अमृत सरोवर, मनरेगा कार्यों और सरकारी धन के उपयोग का पूरा लेखा-जोखा मांगा गया था। आरोप है कि जनसूचना अधिकारी ने नियमों को ताक पर रखकर सूचना दबा दी। इससे ग्रामीणों में यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं विकास योजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितता और सरकारी धन के बंदरबांट का खेल तो नहीं हुआ। ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम प्रधान, पंचायत सचिव, तकनीकी सहायकों और ब्लॉक स्तर के जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत से कागजों में विकास का महल खड़ा किया गया, जबकि धरातल पर हालात बदहाल हैं। अमृत सरोवर योजना हो या पश्चिम तालाब की खुदाई, कई कार्यों में भारी धनराशि खर्च दिखा दी गई लेकिन मौके पर विकास नाम की कोई ठोस तस्वीर दिखाई नहीं देती। गांव में जगह-जगह अधूरे कार्य, जर्जर व्यवस्थाएं और उपेक्षा सरकारी दावों की पोल खोल रही हैं। सूत्रों की मानें तो पंचायत से जुड़े अभिलेखों में भारी गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही है। यही वजह है कि सूचना देने से बचा जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि सबकुछ पारदर्शी है तो फिर ग्राम पंचायत सचिव, जनसूचना अधिकारी और विकास खण्ड प्रशासन सूचना सार्वजनिक करने से आखिर क्यों कतरा रहा है। समाजसेवी देव कृष्ण द्विवेदी पत्रकार ने जिलाधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी, जिला पंचायत राज अधिकारी और खण्ड विकास अधिकारी से पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराकर ग्राम पंचायत के सभी विकास कार्यों का भौतिक सत्यापन कराने की मांग की है। साथ ही दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग भी उठाई है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर आरटीआई की फाइलों पर जमी यह खामोशी सिर्फ लापरवाही है या फिर विकास के नाम पर हुए बड़े खेल को दबाने की सुनियोजित कोशिश।
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