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मध्य प्रदेश: OPS बनाम नेताओं की पेंशन, क्या समानता के नियम सिर्फ कर्मचारियों पर लागू
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: देश में पुरानी पेंशन योजना OPS और नई पेंशन योजना NPS को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: देश में पुरानी पेंशन योजना OPS और नई पेंशन योजना NPS को लेकर बहस लगातार तेज होती जा रही है। सरकारी कर्मचारी वर्षों से OPS बहाली की मांग कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर पूर्व विधायकों और जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली पेंशन व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है की यदि आर्थिक भार का तर्क देकर कर्मचारियों की सुनिश्चित पेंशन व्यवस्था बदली जा सकती है, तो क्या वही सिद्धांत जनप्रतिनिधियों पर लागू नहीं होना चाहिए। वर्ष 2004 के बाद केंद्र सरकार तथा अनेक राज्य सरकारों ने OPS समाप्त कर NPS लागू की। सरकारों का तर्क था कि OPS का वित्तीय भार लगातार बढ़ रहा था और भविष्य में राज्यों की आर्थिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता था। इसी आधार पर योगदान आधारित NPS लाई गई। कानूनी दृष्टि से सरकारों के पास सेवा नियमों में संशोधन करने का अधिकार था। इसलिए OPS से NPS में परिवर्तन वैधानिक रूप से संभव हुआ लेकिन कर्मचारियों की आपत्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सरकारी कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने नौकरी जॉइन करते समय सुरक्षित और सुनिश्चित पेंशन व्यवस्था की अपेक्षा की थी। OPS केवल आर्थिक लाभ नहीं बल्कि बुजुर्गावस्था की सामाजिक सुरक्षा थी। NPS में पेंशन बाजार आधारित निवेश पर निर्भर मानी जाती है, जिसमें निश्चित गारंटी नहीं है। यही कारण है कि कर्मचारियों के बीच असुरक्षा और असंतोष बढ़ा। इसी बीच पूर्व विधायकों और जनप्रतिनिधियों की पेंशन व्यवस्था पर बहस और तेज हो गई। परंतु आलोचक पूछते हैं कि कुछ वर्षों के कार्यकाल पर आजीवन पेंशन, अनेक सुविधाएँ और विशेषाधिकार क्या वास्तव में सामाजिक समानता के अनुरूप हैं। यह विषय केवल कर्मचारियों और नेताओं की तुलना का नहीं है। यह सार्वजनिक धन, सामाजिक न्याय, नीति की समानता और लोकतांत्रिक जवाबदेही का विषय है। आज देश में सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि पेंशन व्यवस्था पारदर्शी हो, सभी वर्गों पर समान सिद्धांत लागू हों, कर्मचारियों की बुजुर्गावस्था सुरक्षा सुनिश्चित हो, और सार्वजनिक धन के उपयोग पर ईमानदार राष्ट्रीय बहस हो। लोकतंत्र में जनता केवल करदाता नहीं, बल्कि मालिक होती है। इसलिए जनता को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि यदि कर्मचारियों की OPS बदली जा सकती है, तो नेताओं की पेंशन व्यवस्था की समीक्षा क्यों नहीं। जब तक नीतियों में समानता और न्याय का भाव दिखाई नहीं देगा, तब तक OPS बनाम NPS की बहस केवल आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि सामाजिक असंतोष का विषय बनी रहेगी।
कर्मचारियों और आम नागरिकों का प्रश्न है कि विधायक किसी नियमित सरकारी सेवा से रिटायर नहीं होते, फिर भी उन्हें आजीवन पेंशन क्यों। यदि कर्मचारियों के लिए वित्तीय भार का तर्क दिया जाता है, तो नेताओं पर वही सिद्धांत क्यों लागू नहीं होता। क्या सार्वजनिक धन के उपयोग में समानता नहीं होनी चाहिए। यह समझना भी आवश्यक है कि विधायकों की पेंशन कोई संवैधानिक मौलिक अधिकार नहीं है। अधिकांश राज्यों में यह संबंधित विधानसभाओं द्वारा बनाए गए कानूनों के तहत संचालित होती है। अर्थात यदि सरकारें और विधानसभाएँ चाहें तो पेंशन समाप्त कर सकती हैं, सीमित कर सकती हैं, योगदान आधारित प्रणाली लागू कर सकती हैं या नए नियम बना सकती हैं।
ठीक उसी प्रकार जैसे कर्मचारियों के लिए OPS से NPS लागू की गई। यहीं से सबसे बड़ा नैतिक प्रश्न खड़ा होता है। क्या आर्थिक अनुशासन केवल कर्मचारियों के लिए है। क्या त्याग और वित्तीय नियंत्रण का भार केवल मध्यमवर्गीय कर्मचारियों पर ही डाला जाएगा। देशभर में सोशल मीडिया पर यह बहस तेजी से फैल रही है। कर्मचारी संगठन कह रहे हैं कि यदि सरकारें वित्तीय संतुलन की बात करती हैं, तो समान नियम सभी पर लागू होने चाहिए।
दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ यह भी तर्क देते हैं कि जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल अनिश्चित होता है, उन्हें नियमित सेवा सुरक्षा नहीं होती, इसलिए कुछ पेंशन व्यवस्था उचित मानी जा सकती है।
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