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मध्य प्रदेश: सुरजपोल-लोकेन्द्र भवन विवाद, कोर्ट के फैसलों के बाद भी प्रशासनिक कार्रवाई पर उठे बड़े सव
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संक्षेप
मध्य प्रदेश: रतलाम के सुरजपोल एवं लोकेन्द्र भवन क्षेत्र से जुड़ा भूमि विवाद अब केवल एक स्थानीय राजस्व प्रकरण नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रश्न बन चुका है कि क्या प्रशासन स्वयं कानून और न्यायालयों से ऊपर कार्य कर सकता है।
विस्तार
मध्य प्रदेश: रतलाम के सुरजपोल एवं लोकेन्द्र भवन क्षेत्र से जुड़ा भूमि विवाद अब केवल एक स्थानीय राजस्व प्रकरण नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रश्न बन चुका है कि क्या प्रशासन स्वयं कानून और न्यायालयों से ऊपर कार्य कर सकता है। सूरज पोल रतलाम स्थित निजी भूमि को वर्ष 2004 में जिला प्रशासन द्वारा शासकीय भूमि घोषित किये जाने के बाद, कालान्तर में अनेक न्यायालयीन निर्णयों, अभिलेखों तथा प्रशासनिक कार्यवाहियों में उक्त भूमि को निजी स्वामित्व की भूमि मानते हुए व्यवहार किया गया। इतना ही नहीं, नगर निगम रतलाम द्वारा भवन निर्माण अनुमति जारी करना भी इस तथ्य का संकेत है कि प्रशासनिक स्तर पर भूमि के निजी स्वरूप को स्वीकार किया गया था। किन्तु आश्चर्यजनक स्थिति तब उत्पन्न होती है जब वर्षों बाद पुन वही प्रशासनिक तंत्र उसी भूमि को शासकीय बताकर भूखण्ड धारकों को नोटिस, आपत्तियों और बाधात्मक कार्यवाहियों के माध्यम से परेशान करने लगता है। यह स्थिति अनेक गंभीर प्रश्न खड़े करती है, यदि न्यायालय भूमि को निजी मान चुके हैं, तो प्रशासन पुनः शासकीय कैसे मान सकता है। यदि भवन निर्माण अनुमति जारी की जा चुकी है, तो नागरिकों का दोष क्या है। क्या प्रशासनिक अधिकारी अपने ही विभागीय रिकॉर्ड से मुकर सकते हैं। क्या नागरिकों को हर कुछ वर्षों में पुन, अपने अधिकार सिद्ध करने के लिये न्यायालयों के चक्कर लगाना ही नियति बना दिया जाये? लोकतंत्र में प्रशासन जनता का सेवक होता है, स्वामी नहीं। जिला प्रशासन को प्राप्त अधिकार संविधान और कानून से आते हैं। इसलिए प्रशासनिक आदेश तभी तक मान्य हैं जब तक वे न्यायालयीन निर्णयों एवं विधिक सिद्धांतों के अनुरूप हों। माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों के विपरीत जाकर यदि कोई अधिकारी पुनः उसी विषय को विवादित बनाता है, तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि विधि शासन (Rule of Law) की भावना के विपरीत स्थिति है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि नागरिक वर्षों तक कर देते हैं, भवन अनुमति लेते हैं, वैध दस्तावेजों के आधार पर निर्माण करते हैं, और बाद में वही प्रशासन उन्हें अवैध बताने लगता है। इससे आम जनता का शासन व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होता है। यदि सरकार का एक विभाग अनुमति दे और दूसरा विभाग उसी को अवैध बताये, तो अंततः नागरिक किस पर विश्वास करे। क्या प्रशासनिक विरोधाभास का भार केवल आम नागरिक ही उठायेगा। यह भी विचारणीय है कि यदि किसी अधिकारी द्वारा न्यायालयीन निर्णयों की अनदेखी कर नागरिकों को अनावश्यक मुकदमेबाजी में धकेला जाता है, तो उसकी व्यक्तिगत जवाबदेही क्यों तय नहीं होती। निजी व्यक्ति न्यायालय की अवमानना करे तो दण्ड का प्रावधान है, परन्तु प्रशासनिक स्तर पर गलत आदेशों और लापरवाही की जवाबदेही प्रायः धुंधली क्यों हो जाती है। सुरजपोल एवं लोकेन्द्र भवन प्रकरण केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा है। यह प्रकरण बताता है कि नागरिकों को केवल न्यायालय से निर्णय प्राप्त करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उस निर्णय का प्रशासनिक सम्मान सुनिश्चित होना भी उतना ही आवश्यक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि न्यायालयीन आदेशों का पूर्ण सम्मान हो, प्रशासनिक रिकॉर्ड में स्थायित्व और स्पष्टता हो, वर्षों पुराने विवादों को बार-बार जीवित कर नागरिकों को प्रताड़ित न किया जाये, तथा गलत एवं विरोधाभासी कार्यवाहियों के लिये जिम्मेदारी तय हो। लोकतंत्र में कानून सर्वोच्च है न कि कोई पद, कार्यालय या अधिकारी। जब प्रशासन स्वयं विधि शासन का सम्मान करेगा, तभी आम नागरिकों में कानून के प्रति विश्वास और अनुशासन मजबूत होगा।
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