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राजस्थान: 31 साल पुराना नियम खत्म, पंचायत चुनाव में दो-संतान की अनिवार्यता हुई समाप्त

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राजस्थान  Published by: Pramod Kumar Bansal , Date: 15/07/2026 10:28:44 am Share:
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  • 15/07/2026 10:28:44 am
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संक्षेप

राजस्थान: कोटपूतली राजस्थान में आगामी पंचायत चुनावों से ठीक पहले एक ऐतिहासिक और बेहद महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव हुआ है। 

विस्तार

राजस्थान: कोटपूतली राजस्थान में आगामी पंचायत चुनावों से ठीक पहले एक ऐतिहासिक और बेहद महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव हुआ है। राज्य में अब दो से अधिक संतान होने पर पंचायत चुनाव लड़ने की अयोग्यता को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है। राजस्थान निर्वाचन आयोग ने इस संबंध में आधिकारिक आदेश जारी करते हुए सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को दिशा-निर्देश भेज दिए हैं। राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम, 1994 में संशोधन के बाद पंचायत चुनाव लड़ने के लिए लागू दो-संतान संबंधी प्रावधान को हटा दिया गया है। राज्य निर्वाचन आयोग ने सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश जारी करते हुए अधिसूचना से अवगत कराया है। इस बदलाव के बाद अब पंचायत चुनावों में उम्मीदवारों की पात्रता पर दो से अधिक संतान होने की शर्त लागू नहीं रहेगी।

31 साल पुराना नियम हुआ खत्म : राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान पंचायतीराज (संशोधन) अधिनियम, 2026 पारित किए जाने के बाद इस दशकों पुराने प्रतिबंध को हटाया गया है। इससे पहले वर्ष 1995 से तत्कालीन भैरोंसिंह शेखावत सरकार के समय से दो से अधिक संतान वाले उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने पर रोक लागू थी। नए संशोधन के बाद अब उम्मीदवारों की पात्रता सूची से इस शर्त को हटा दिया गया है। राज्य निर्वाचन आयोग ने सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को पत्र और राजपत्र अधिसूचना की प्रति भेजकर नए नियमों से अवगत करा दिया है। 

योग्यता का नया पैमाना :  अब वार्ड पंच, सरपंच, प्रधान, जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के चुनाव में ’दो संतान’ संबंधी नियम बाधा नहीं बनेगा। आयोग ने साफ किया है कि अब नामांकन पत्रों की जांच के दौरान दो से अधिक संतान होने के आधार पर किसी भी उम्मीदवार का पर्चा खारिज नहीं किया जायेगा।

इस फैसले का चुनावों पर क्या होगा असर : इस बड़े बदलाव के बाद अब पंचायत चुनावों में उम्मीदवारों का दायरा काफी बढ़ जाएगा। कई ऐसे अनुभवी और स्थानीय स्तर पर मजबूत नेता, जो तीसरी संतान होने के कारण पिछले कई वर्षों से चुनाव नहीं लड़ पा रहे थे, अब फिर से चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमा सकेंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले से ग्रामीण ईलाकों की चुनावी जंग पहले से कहीं अधिक रोचक और त्रिकोणीय होने की उम्मीद है।


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