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उत्तर प्रदेश: बजट सत्र में उठा प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा, विधायक का बयान आया सामने 

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उत्तर प्रदेश  Published by: Anil , Date: 25/02/2026 03:23:37 pm Share:
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  • 25/02/2026 03:23:37 pm
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संक्षेप

उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश के बजट सत्र में जो मुद्दा उठा, वह केवल विधायकों की नाराज़गी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गूंजती हुई सच्चाई है।

विस्तार

उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश के बजट सत्र में जो मुद्दा उठा, वह केवल विधायकों की नाराज़गी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गूंजती हुई सच्चाई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के विधायकों ने सदन में आरोप लगाया कि जिले के अधिकारी उनका फोन तक नहीं उठाते। सोचिए, जब जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि ही अफसर से बात नहीं कर पा रहा, तो आम नागरिक की क्या स्थिति होगी? प्रदेश के समाज कल्याण मंत्री अरुण असीम ने इस समस्या को गंभीर मानते हुए गाजियाबाद, हरदोई और कन्नौज में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में कमान सेंटर स्थापित करने का आदेश दिया है, ताकि विधायक और प्रशासन के बीच संवाद की व्यवस्था बने। इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए पूर्व अध्यक्ष छात्र संघ शीलभद्र सिंह प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा किया है। लेकिन असली सवाल इससे भी बड़ा है —अधिकारी विधायक का फोन नहीं उठाते। विधायक जनता का फोन नहीं उठाते। सांसद और मंत्री तक आम आदमी की सीधी पहुँच नहीं। प्रदेश के गांवों में आज भी बीमार व्यक्ति इलाज के लिए भटक रहा है।

 

सरकारी अस्पतालों में दवाइयाँ नहीं, डॉक्टरों की कमी है। छात्र वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरते हैं — चार-चार साल तक परीक्षा का इंतजार, और परीक्षा के बाद परिणाम के लिए फिर वर्षों की प्रतीक्षा। युवाओं का भविष्य कागज़ों में अटका है, परिवार कर्ज़ में डूब रहे हैं, और व्यवस्था मौन है। सवाल उठता है- जब वेतन और भत्ते बढ़ाने की बात आती है तो सदन में मेज़ें एक साथ थपथपाई जाती हैं, लेकिन जब जनता की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की बात आती है तो आवाज़ें क्यों धीमी पड़ जाती हैं? यह मुद्दा केवल “फोन न उठाने” का नहीं है। यह मुद्दा है जिम्मेदारी का, संवेदनशीलता का और लोकतंत्र की आत्मा का। यदि जनप्रतिनिधि और प्रशासन के बीच संवाद नहीं होगा,यदि जनता की शिकायत सुनने की व्यवस्था नहीं होगी। तो लोकतंत्र केवल कागज़ों में रह जाएगा। आज जरूरत है जवाबदेही तय करने की। जरूरत है यह तय करने की कि जनता की आवाज़ सबसे ऊपर है — न कि कुर्सी, न पद, न अहंकार।