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राजस्थान: कभी विदेशों तक था टोंक के खरबूजों का जलवा, अब पहचान बचाने की मिली चुनौती
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संक्षेप
राजस्थान: टोंक जिसे राजस्थान के लखनऊ के रूप में जाना जाता है, अपनी नजाकत और तहजीब के साथ-साथ बनास नदी के मीठे खरबूजों के लिए भी विश्व विख्यात रहा है।
विस्तार
राजस्थान: टोंक जिसे राजस्थान के लखनऊ के रूप में जाना जाता है, अपनी नजाकत और तहजीब के साथ-साथ बनास नदी के मीठे खरबूजों के लिए भी विश्व विख्यात रहा है। किसी समय में टोंक के खरबूजे न केवल स्थानीय मंडियों की शान हुआ करते थे, बल्कि दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों के रास्ते अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक अपनी पहुंच रखते थे। हालांकि, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस 'मीठी विरासत' के सामने मांग और आपूर्ति के समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य और फल मंडी में मांग आज भी गर्मी की आहट होते ही जयपुर और आसपास की मंडियों में टोंक के खरबूजे की मांग चरम पर होती है। अपनी प्राकृतिक मिठास और विशेष सुगंध के कारण उपभोक्ता इसे अन्य हाइब्रिड किस्मों की तुलना में अधिक प्राथमिकता देते हैं। मंडियों में स्थिति यह है कि: निर्यात का विश्लेषण भारत दुनिया के प्रमुख खरबूजा निर्यातकों में से एक है, जो मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को आपूर्ति करता है। टोंक के खरबूजों में निर्यात की अपार संभावनाएं होने के बावजूद, कुछ तकनीकी और बुनियादी बाधाएं आड़े आ रही हैं 1. शेल्फ-लाइफ की चुनौती: टोंक का खरबूजा अत्यधिक रसीला होता है, जिसके कारण यह लंबी दूरी के परिवहन के दौरान जल्दी खराब होने लगता है। इसके लिए 'कोल्ड चेन लॉजिस्टिक्स' की भारी कमी है। ग्रेडिंग और पैकेजिंग वैश्विक मानकों के अनुसार निर्यात के लिए फलों का आकार एक समान और कीट-मुक्त होना अनिवार्य है। टोंक के किसानों के पास आधुनिक ग्रेडिंग और सॉर्टिंग मशीनों का अभाव है। हाइब्रिड का मुकाबला अंतरराष्ट्रीय बाजार में अब ऐसी किस्मों की मांग बढ़ रही है जो कम मीठी लेकिन अधिक टिकाऊ हों, जबकि टोंक का खरबूजा अपनी अत्यधिक मिठास के लिए जाना जाता है। यदि टोंक के खरबूजे को फिर से वैश्विक पटल पर मजबूती से स्थापित करना है, तो सरकार को APEDA के माध्यम से विशेष प्रोत्साहन योजनाएं लानी होंगी। किसानों को 'जायद' की फसल के रूप में आधुनिक सिंचाई तकनीकों और वैज्ञानिक पैकेजिंग का प्रशिक्षण देना समय की मांग है। टोंक की इस पहचान को लुप्त होने से बचाना न केवल सांस्कृतिक अनिवार्यता है, बल्कि यह क्षेत्र के किसानों की आर्थिक समृद्धि का मुख्य मार्ग भी हो सकता है। क्या आप टोंक के खरबूजा उत्पादकों के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही कृषि अनुदान योजनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहेंगे?
प्रीमियम मांग टोंक के खरबूजे को एक 'ब्रांड' के रूप में देखा जाता है, जिसके लिए ग्राहक अधिक कीमत देने को भी तैयार रहते हैं। घटती आवक बीसलपुर बांध के निर्माण और बनास नदी में अनियंत्रित बजरी खनन के कारण खेती का क्षेत्रफल कम हुआ है, जिससे मांग की तुलना में आपूर्ति काफी कम रह गई है।
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