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मध्य प्रदेश: बैंकिंग पेंशन विवाद, वैधानिक प्रावधानों की व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टता की करी मांग
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विस्तार
मध्य प्रदेश: बैंकिंग पेंशन व्यवस्था को लेकर एक बार फिर कानूनी बहस तेज होती दिखाई दे रही है। इस बार मुद्दा केवल पेंशन संशोधन या वित्तीय लाभ का नहीं, बल्कि बैंकिंग पेंशन की वैधानिक स्थिति, द्विपक्षीय समझौतों की कानूनी सीमा और भारतीय बैंक संघ (IBA) सहित संबंधित पक्षों की जवाबदेही से जुड़ा हुआ है। इस संबंध में वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता कमल पाटनी ने कई महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाते हुए सर्वोच्च न्यायालय से स्पष्ट व्याख्या की आवश्यकता जताई है। कमल पाटनी का कहना है कि बैंकिंग पेंशन केवल IBA और यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस के बीच हुआ कोई सामान्य द्विपक्षीय समझौता नहीं है। उनका तर्क है कि बैंकिंग कंपनियाँ अधिग्रहण एवं उपक्रमों का अंतरण अधिनियम की धारा 19(2)(f) के तहत जब पेंशन संबंधी विनियमों को भारत सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित किया जाता है, तब वे कानून का हिस्सा बन जाते हैं। ऐसे में किसी भी द्विपक्षीय समझौते या उसकी व्याख्या को इन्हीं वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप होना आवश्यक है। उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि यदि किसी न्यायिक निर्णय में इन वैधानिक प्रावधानों की गलत व्याख्या की गई है, तो उसके कानूनी प्रभावों की समीक्षा होना आवश्यक है। उनका मत है कि इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पेंशन से संबंधित निर्णय केवल द्विपक्षीय समझौतों के आधार पर लागू किए जा सकते हैं या उन्हें अधिनियम और अधिसूचित पेंशन विनियमों के अनुरूप होना अनिवार्य है। कमल पाटनी ने वर्ष 2015 से 2025 के बीच दिवंगत हुए लगभग ढाई से तीन लाख बैंक पेंशनरों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि इस अवधि में पेंशन संबंधी लाभों में कोई वैधानिक कमी या वित्तीय वंचना हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में लगभग साढ़े सात से आठ लाख पेंशनरों पर पड़े आर्थिक प्रभाव का भी निष्पक्ष मूल्यांकन होना चाहिए और यदि किसी संस्था की कानूनी जिम्मेदारी सिद्ध होती है तो उसके विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने सरकार के वित्तीय सेवा विभाग (DFS) की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि यदि पेंशनरों के कल्याण के लिए स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम संबंधी निधि के उपयोग में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उनके अनुसार, पेंशनरों के हितों से जुड़े प्रत्येक निर्णय में पारदर्शिता और वैधानिक प्रक्रिया का पालन सर्वोपरि होना चाहिए। हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि उपर्युक्त सभी दावे और कानूनी तर्क कमल पाटनी द्वारा व्यक्त किए गए विचार हैं। इन दावों पर अभी किसी सक्षम न्यायालय द्वारा अंतिम निर्णय नहीं दिया गया है। अब इस पूरे मामले में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यदि यह मुद्दा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आता है, तो वह बैंकिंग पेंशन की वैधानिक स्थिति, द्विपक्षीय समझौतों की सीमा और संबंधित पक्षों की जवाबदेही पर क्या स्पष्ट कानूनी व्याख्या प्रस्तुत करता है।
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