-
☰
मध्य प्रदेश: अदालत की अवमानना और न्याय व्यवस्था पर उठे सवाल, जवाबदेही पर शुरू हुई नई बहस
- Photo by :
विस्तार
मध्य प्रदेश: न्यायपालिका की गरिमा, अदालत की अवमानना और न्याय व्यवस्था की जवाबदेही को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सामाजिक चिंतक कमल पाटनी ने एक विचार लेख के माध्यम से सवाल उठाया है कि अदालत की अवमानना को केवल नागरिक के अनुचित व्यवहार तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि न्यायिक व्यवस्था के समक्ष मौजूद चुनौतियों और आम नागरिक के विश्वास से जुड़े पहलुओं पर भी गंभीर चर्चा होनी चाहिए। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिकाकर्ता द्वारा कथित रूप से अदालत की कार्यवाही के दौरान कागज फेंकने और न्यायाधीशों के प्रति अभद्र भाषा के प्रयोग की घटना चर्चा का विषय बनी। इस घटना को लेकर कमल पाटनी ने कहा कि न्यायालय की गरिमा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है और न्यायालय में असम्मानजनक व्यवहार का समर्थन नहीं किया जा सकता। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी घटनाओं के पीछे उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों और नागरिकों के बढ़ते असंतोष को भी समझना आवश्यक है। उन्होंने अपने लेख में कहा कि लोकतंत्र केवल नागरिकों की जिम्मेदारी से नहीं चलता, बल्कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों संवैधानिक संस्थाओं की समान जवाबदेही होती है। यदि नागरिकों से कानून और मर्यादा का पालन करने की अपेक्षा की जाती है, तो न्यायपालिका से भी समयबद्ध, निष्पक्ष और प्रभावी न्याय प्रदान करने की अपेक्षा स्वाभाविक है। लेख में न्यायिक प्रक्रियाओं में होने वाले विलंब को भी प्रमुख चिंता का विषय बताया गया है। उन्होंने प्रसिद्ध उक्ति "Justice delayed is justice denied" का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्षों तक लंबित रहने वाले मुकदमे, बार-बार स्थगन और न्याय मिलने में अत्यधिक देरी आम नागरिक के विश्वास को प्रभावित करती है। उनका मानना है कि न्याय में देरी केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय भी है। कमल पाटनी ने यह भी कहा कि भारतीय संविधान ने न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाया है, लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक संस्था की तरह न्यायपालिका भी तथ्यपरक और मर्यादित आलोचना से परे नहीं हो सकती। उनके अनुसार सम्मान किसी पद से नहीं, बल्कि निष्पक्षता, पारदर्शिता, संवेदनशीलता और न्यायिक कार्यप्रणाली से अर्जित होता है। उन्होंने निष्कर्ष में कहा कि अदालत की अवमानना करने वालों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होना आवश्यक है, लेकिन साथ ही न्यायपालिका को भी आत्ममंथन करना चाहिए कि कहीं न्यायिक प्रक्रिया में विलंब, बढ़ते लंबित मामलों और आम नागरिक की कठिनाइयों के कारण लोगों में निराशा तो नहीं बढ़ रही। उनके अनुसार लोकतंत्र में सम्मान और जवाबदेही एक-दूसरे के पूरक हैं तथा न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति जनता का विश्वास है, जिसे समयबद्ध और प्रभावी न्याय के माध्यम से और मजबूत किया जा सकता है।
गुजरात: खराब सड़क से आवागमन हुआ प्रभावित, प्रशासन से तत्काल कार्रवाई की करी अपील
झारखण्ड: नगर अध्यक्ष ने दिलाई जल संरक्षण की शपथ, वर्षा जल संचयन पर दिया जोर
गुजरात: राजकोट के शापर-वेरावल में गंदगी से बीमारी का खतरा, जनता ने उठाई आवाज
उत्तर प्रदेश: पुलिस का अपराधियों पर कड़ा शिकंजा, 19 मुकदमों वाला हिस्ट्रीशीटर नाजिम हुआ गिरफ्तार
गुजरात: समेजा थेबा समाज का स्नेह मिलन आज, एकता और संगठन को मिलेगी नई मजबूती